हिंदू पुराणों में रावण का चरित्र हमेशा से दोहरे रंगों वाला रहा है। एक तरफ वह लंका का प्रतापी राजा, वेदों का ज्ञाता और महान योद्धा था। दूसरी तरफ अहंकार और अधर्म का प्रतीक। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उसके शिव भक्त होने को लेकर होती है। लोग अक्सर पूछते हैं कि अगर रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का सेवक था, तो इस जन्म में वह शिव का इतना बड़ा उपासक कैसे बन गया।
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इस सवाल का जवाब श्रीमद्भागवत पुराण में साफ मिलता है। कथा जटिल नहीं है, लेकिन इसमें भक्ति, शाप और लीला तीनों का मेल है।
वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय
भागवत पुराण के अनुसार रावण और कुंभकर्ण पहले वैकुंठ धाम के द्वारपाल थे। उनके नाम जय और विजय थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त और विश्वसनीय सेवक थे। एक दिन सनकादि चार कुमार वैकुंठ आए। वे बाल रूप में दिखते थे। जय-विजय ने उन्हें रोक दिया। कुमारों ने इसे अपना अपमान माना और दोनों को शाप दे दिया कि तुम दोनों तीन बार राक्षस योनि में जन्म लोगे।

तीन जन्मों का शाप और अवतार
भगवान विष्णु ने स्थिति समझी। उन्होंने जय-विजय को दो विकल्प दिए। या तो सात जन्म भक्त बनकर बिताओ, या तीन जन्म मेरे शत्रु बनकर जल्दी वापस आ जाओ। दोनों ने जल्दी वैकुंठ लौटने के लिए तीन जन्म शत्रु बनने का रास्ता चुना।
उनके तीन जन्म इस प्रकार हुए:
- पहला जन्म (सतयुग): हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में। दोनों का वध भगवान विष्णु के वराह और नृसिंह अवतार ने किया।
- दूसरा जन्म (त्रेता युग): रावण और कुंभकर्ण के रूप में।
- तीसरा जन्म (द्वापर युग): शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में।
हर बार मृत्यु विष्णु के अवतार के हाथों हुई।
रावण का राक्षस जन्म और शिव भक्ति का प्रारंभ
इस जन्म में रावण महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र बना। पिता की तरफ से ब्राह्मण कुल था, माता की तरफ से राक्षस। वह बचपन से ही अत्यंत मेधावी था। वेद, शास्त्र, संगीत और ज्योतिष में पारंगत हो गया। लेकिन उसके अंदर सत्ता, बल और अहंकार की तीव्र लालसा भी थी।
शक्ति पाने के लिए उसने कठोर तपस्या शुरू की। पहले ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि देवता, गंधर्व, यक्ष किसी से भी न मारे जाऊँ। फिर शिव की आराधना की। कई वर्षों तक कठिन तप किया। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार उसने अपने दस सिर एक-एक करके शिव को अर्पित करने शुरू कर दिए। जब दसवां सिर काटने लगा तो शिव प्रकट हुए और वरदान दिए।

कैलाश पर्वत उठाने की कथा और शिव तांडव स्तोत्र
सबसे चर्चित घटना कैलाश पर्वत की है। रावण अपनी शक्ति के घमंड में कैलाश को लंका ले जाना चाहता था। उसने पर्वत उठाने की कोशिश की। शिव ने अंगूठे से दबा दिया। रावण के हाथ दब गए। असहनीय दर्द में उसने वहीं बैठकर शिव की स्तुति की। वही स्तुति आज शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जानी जाती है। शिव प्रसन्न हुए, हाथ मुक्त किए और चंद्रहास तलवार दी।
विष्णु सेवक और शिव भक्त: दोनों बातों में विरोध क्यों नहीं?
पूर्व जन्म में विष्णु का सेवक होना और इस जन्म में शिव का परम भक्त होना एक-दूसरे के खिलाफ नहीं है। शाप के कारण रावण को राक्षस योनि और रजस-तमस गुण मिले। इन गुणों के साथ उसने शक्ति के लिए शिव की आराधना की। उसकी भक्ति सच्ची थी, लेकिन अहंकार से मिली हुई थी।
शिव भक्ति ने उसे अपार बल दिया। उसी बल ने उसे तीनों लोकों का विजेता बनाया। लेकिन वही बल अंत में उसके पतन का कारण बना। राम के हाथों मारे जाने से उसका शाप पूरा हुआ। वह फिर वैकुंठ लौट गया।
यही लीला का स्वरूप है। शत्रु बनकर भी वह विष्णु की सेवा कर रहा था। कई आचार्य कहते हैं कि रावण की शिव भक्ति और राम से शत्रुता दोनों एक ही योजना के हिस्से थे।

रामायण और पुराणों में अंतर
वाल्मीकि रामायण में रावण की शिव भक्ति का विस्तार कम है। मुख्य रूप से वह ब्रह्मा का वरदान प्राप्त राजा है। शिव तांडव स्तोत्र और कैलाश वाली कथा बाद के पुराणों, लोक परंपराओं और शैव ग्रंथों में ज्यादा विस्तार से मिलती है। तुलसीदास के रामचरितमानस में भी रावण के पूर्व जन्म की थोड़ी अलग कथा है, लेकिन भागवत की जय-विजय कथा सबसे व्यापक रूप से मान्य है।
दोनों परंपराओं में एक बात साफ है। रावण ज्ञान और तपस्या की ऊँचाई पर था। लेकिन अहंकार ने उसे अधर्म की तरफ खींच लिया। शिव भक्त होने के बावजूद उसने सीता हरण जैसा कर्म किया। यही उसके चरित्र का सबसे बड़ा पाठ है।
आज इस कथा का क्या महत्व है?
यह कथा सिर्फ पौराणिक कहानी नहीं है। यह बताती है कि भक्ति के साथ अहंकार हो तो परिणाम विनाशकारी हो सकता है। रावण ने शिव से शक्ति ली, लेकिन उस शक्ति का उपयोग धर्म के खिलाफ किया। राम ने भी शिव की पूजा की, लेकिन मर्यादा के साथ। दोनों शिव भक्त थे, लेकिन परिणाम अलग-अलग निकले।
आज जब लोग रावण की शिव भक्ति की बात करते हैं तो अक्सर उसकी विद्वत्ता और संगीत ज्ञान को याद करते हैं। शिव तांडव स्तोत्र आज भी मंदिरों में गाया जाता है। लेकिन कथा याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति अहंकार से मुक्त होनी चाहिए।
रावण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि पूर्व जन्म के संस्कार इस जन्म को पूरी तरह नियंत्रित नहीं करते। कर्म और अहंकार नए संस्कार बनाते हैं। जय-विजय वैकुंठ के शुद्ध सेवक थे। रावण लंका का अहंकारी राजा बन गया। दोनों के बीच शाप और कर्म की लंबी श्रृंखला थी।
पुराणों में बार-बार यही संदेश दोहराया गया है। भक्ति हो, ज्ञान हो, बल हो, लेकिन धर्म के बिना सब व्यर्थ है। रावण के पास तीनों थे। धर्म नहीं था। इसलिए अंत राम के हाथों हुआ।
